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विचार और चरित्र का क्या सम्बंध है?

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जेम्स एलेन (28 नवंबर 1864 – 24जनवरी 1912) एक ब्रिटिश दार्शनिक व लेखक थे जो अपनी प्रेरणादायक पुस्तकों और कविताओं और स्वयं सहायता आंदोलन ( Self Help Movement ) के अग्रणी के रूप में जाने जाते थे। उनकी सबसे प्रसिद्ध पुस्तक “जैसा कि एक व्यक्ति सोचता है” ( As A Man Thinketh ) 1903 में प्रकाशन के बाद से आज तक बड़े पैमाने पर प्रसारित हुई है। यह प्रेरकों और स्वयं सहायता लेखकों के लिए प्रेरणा का स्रोत रहा है।

तो प्रस्तुत है जेम्स एलेन (James  Allen) की प्रसिद्ध कृति “जैसा कि एक व्यक्ति सोचता है”  (As A Man Thinketh) का स्वतंत्र हिंदी अनुवाद; अध्याय 1: विचार और चरित्र

कहावत है कि “जैसा कि एक आदमी अपने दिल में सोचता है, वह वही होता है।” यह विचार न केवल व्यक्ति के समस्त अस्तित्व के सत्य को प्रतिबिंबित करता है बल्कि इतना व्यापक है कि उसके जीवन की हर स्थिति और परिस्थिति तक में सम्मिलित है। Thoughts and Characters Are the Key to Each Other.

एक इंसान जो कुछ सोचता है, उसके सभी विचार, सचमुच में वे उसके चरित्र का पूरा सारांश है। जिस प्रकार एक बीज से पौधा उत्पन्न होता है और बीज के बिना हो ही नहीं सकता है; उसी प्रकार आदमी का हर कार्य विचार-रूपी छिपे हुए बीज से प्रकट होता है एवं उसके बिना उत्पन्न हो ही नहीं सकता है। यह उन सभी कार्यों पर समान रूप से लागू होता है जो या तो “सहज” यानि “बिना सोचे-समझे” होते हों अथवा जो जानबूझकर किये जाते है। कर्म अथवा कार्य जो हैं वे विचारों का खिलना ही है और आनंद तथा दु:ख इसके फल हैं। इस प्रकार एक व्यक्ति स्वयं ही अपने लिए मीठे या कड़वे फल उगाता और उन्हें भोगता है।

हमारे मन में उठे विचार ने ही हमें बनाया है एवं हम क्या हैं, जो कुछ हैं, इसे विचार से ही गढ़ा और ढाला गया है। यदि किसी व्यक्ति के दिमाग में बुरे विचार हैं तो उसके पीछे दु:ख-दर्द आता है  लेकिन यदि कोई लगातार विचार की शुद्धता में है तो उसकी छाया की भांति, आनंद उसका अनुसरण करता है, यह निश्चित है।

एक नेक और ईश्वरीय चरित्र एहसान या संयोग की चीज़ नहीं है

मनुष्य एक नियम के द्वारा विकसित हुआ है न कि किसी रचना या युक्ति के द्वारा।  कारण और प्रभाव का नियम विचार-रूपी छिपी हुई दुनिया हो अथवा दृश्य यानि भौतिक दुनिया हो, दोनों ही में सामान रूप से व बिना किसी उल्लंघन के लागू होता है। एक नेक और ईश्वरीय चरित्र एहसान या संयोग की चीज़ नहीं है बल्कि ईश्वरीय विचारों के साथ लंबे समय तक संजोया और पोषित किए हुए सही सोच और निरंतर प्रयास का स्वाभाविक परिणाम है। एक अकुलीन और पाशविक चरित्र, इसी प्रक्रिया द्वारा, निम्न कोटि के विचारों के निरंतर पोषण का परिणाम है।

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