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ध्यान का अभ्यास

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जेम्स एलेन (James Allen) की प्रसिद्ध कृति “भाग्य पर महारत” (Mastery of Destiny) का स्वतंत्र हिंदी अनुवाद, अध्याय 8: ध्यान का अभ्यास
जब आकांक्षा एकाग्रता से मिल जाती है तो परिणाम ध्यान होता है। जब कोई व्यक्ति केवल सांसारिक और आनंदमय जीवन की तुलना में उच्च, शुद्ध और अधिक उज्ज्वल जीवन तक पहुंचने और महसूस करने की तीव्र इच्छा रखता है, तो वह आकांक्षा या अभीप्सा में संलग्न होता है और जब वह अपने विचारों को उस जीवन की खोज पर केंद्रित करता है तो वह ध्यान का अभ्यास करता है।

तीव्र अभीप्सा के बिना ध्यान नहीं हो सकता। सुस्ती और उदासीनता इसके अभ्यास के लिए घातक है। मनुष्य का स्वभाव जितना तीव्र होगा, वह उतनी ही सहजता से ध्यान को प्राप्त करेगा और उतनी ही सफलतापूर्वक वह इसका अभ्यास करेगा। एक उग्र प्रकृति सबसे तेजी से ध्यान में सत्य की ऊंचाइयों को छूएगी, जब उसकी आकांक्षाएं पर्याप्त रूप से जागृत हो जाएंगी।

आध्यात्मिक सफलता के लिए जरूरी है ध्यान

सांसारिक सफलता के लिए जरूरी है एकाग्रता : आध्यात्मिक सफलता के लिए जरूरी है ध्यान। सांसारिक कौशल और ज्ञान एकाग्रता से प्राप्त होते हैं; आध्यात्मिक कौशल और ज्ञान ध्यान से प्राप्त होते हैं। एकाग्रता से मनुष्य प्रतिभा की उच्चतम ऊंचाइयों को छू सकता है लेकिन वह सत्य की स्वर्गीय ऊंचाइयों को नहीं छू सकता–इसे पूरा करने के लिए उसे ध्यान करना चाहिए।

एकाग्रता से मनुष्य सीजर ( Caesar ) की अद्भुत समझ और विशाल शक्ति प्राप्त कर सकता है; ध्यान के द्वारा वह बुद्ध सा दिव्य ज्ञान और पूर्ण शांति प्राप्त कर सकता है। एकाग्रता की पूर्णता शक्ति है और ध्यान की पूर्णता ज्ञान है। एकाग्रता से मनुष्य जीवन के कार्यों को करने में निपुणता प्राप्त करते हैं – विज्ञान, कला, व्यापार आदि में लेकिन ध्यान से वे जीवन में ही कौशल प्राप्त कर लेते हैं जैसे: सही जीवन जीना, ज्ञान, और निर्वाण आदि। संत, ऋषि, उद्धारकर्ता,  बुद्धिमान पुरुष और दिव्य शिक्षक सभी पवित्र ध्यान के उत्पाद हैं।

ध्यान में एकाग्रता के चार चरणों को काम में लिया जाता है; इन दो शक्तियों के बीच का अंतर दिशा का है, न कि प्रकृति का। इसलिए ध्यान आध्यात्मिक एकाग्रता है; दिव्य ज्ञान, दिव्य जीवन की खोज में मन को गहन रहन-सहन, विचार और सत्य पर एकाग्र करना ध्यान है।

इस प्रकार मनुष्य अन्य सभी चीजों से ऊपर, सत्य को जानने और महसूस करने की इच्छा रखता है; फिर वह आचरण पर, जीवन पर, आत्म-शुद्धि पर ध्यान देता है: इन बातों पर ध्यान देते हुए, वह जीवन के तथ्यों, समस्याओं और रहस्य के गंभीर चिंतन में चला जाता है: इस प्रकार चिंतन करते हुए, वह सत्य को पूरी तरह और तीव्रता से प्रेम करने लगता है उसमें पूर्णतया लीन होने के लिए मन अनेक इच्छाओं में भटकना बंद कर देता है, और जीवन की समस्याओं को एक-एक करके हल करते हुए, सत्य के साथ उस गहन मिलन को महसूस करता है जो कि अमूर्तता की अवस्था है। और इस प्रकार सत्य में लीन, चरित्र का वह संतुलन, विश्राम में ऐसी दिव्य क्रिया है जो एक मुक्त और प्रबुद्ध मन की स्थायी शांति है।

ध्यान में शुद्धि की क्रिया आवश्यक है

एकाग्रता की तुलना में ध्यान का अभ्यास करना अधिक कठिन है क्योंकि इसमें एकाग्रता से प्राप्त होने वाले आत्म-अनुशासन की तुलना में बहुत अधिक गंभीर आत्म-अनुशासन शामिल है। एक आदमी अपने दिल और जीवन को शुद्ध किए बिना एकाग्रता का अभ्यास कर सकता है जबकि ध्यान में शुद्धि की क्रिया आवश्यक है।

ध्यान का उद्देश्य दिव्य ज्ञान या सत्य की प्राप्ति है और इसलिए यह व्यावहारिक शुद्धता और धार्मिकता के साथ जुड़ा हुआ है। इस प्रकार, शुरुआत में , वास्तविक ध्यान में बिताया गया समय कम होता है – शायद सुबह में केवल आधा घंटा — उस आधे घंटे की प्रबल इच्छा और एकाग्र विचार में प्राप्त ज्ञान पूरे दिन के दौरान साथ रहता है।

इसलिए ध्यान में, मनुष्य का पूरा जीवन शामिल होता है; और जैसे-जैसे वह अपने अभ्यास में आगे बढ़ता है, वह उन परिस्थितियों में जीवन के कर्तव्यों का पालन करने के लिए अधिक से अधिक योग्य हो जाता है जो उसके सामने आती  है क्योंकि वह मजबूत, पवित्र, शांत और बुद्धिमान बन जाता है। ध्यान का सिद्धांत दोहरा है, अर्थात्:

1. शुद्ध वस्तुओं पर बार-बार विचार करने से हृदय की शुद्धि होती है।

2. ऐसी पवित्रता को व्यावहारिक जीवन में धारण करके दिव्य ज्ञान की प्राप्ति होती है।

मनुष्य एक विचार है, और उसका जीवन और चरित्र उन विचारों से निर्धारित होता है जिनमें वह आदतन रहता है। अभ्यास, संगति और आदत से, विचार स्वयं को अधिक से अधिक आसानी और आवृत्ति के साथ दोहराने की प्रवृत्ति रखते हैं। और इसलिए उस स्वचालित क्रिया को उत्पन्न करके एक निश्चित दिशा में चरित्र को “ठीक” करें जिसे “आदत” कहा जाता है।

शुद्ध विचारों पर नित्य निवास करके, ध्यान करने वाला व्यक्ति शुद्ध और प्रबुद्ध सोच की आदत बनाता है जो शुद्ध और प्रबुद्ध कार्यों और अच्छे कर्तव्यों की ओर ले जाता है। शुद्ध विचारों के निरंतर दोहराव से, वह अंत में उन विचारों के साथ एक हो जाता है, और एक शुद्ध और बुद्धिमान जीवन में शुद्ध कार्यों द्वारा अपनी उपलब्धि को प्रकट करता है।

अधिकांश पुरुष परस्पर विरोधी इच्छाओं, जुनून, भावनाओं और अटकलों की एक श्रृंखला में रहते हैं, और उनमें बेचैनी, अनिश्चितता और दुःख होता है; लेकिन जब कोई व्यक्ति अपने मन को ध्यान में प्रशिक्षित करना शुरू करता है तो वह धीरे-धीरे अपने विचारों को एक सिद्धांत पर केंद्रित करके इस आंतरिक संघर्ष पर नियंत्रण प्राप्त करता है।

इस तरह अशुद्ध, गलत विचार और कर्म की पुरानी आदतें टूट जाती हैं और शुद्ध, प्रबुद्ध विचार और कर्म की नई आदतों का निर्माण होता है। मनुष्य सत्य के साथ अधिकाधिक मेल-मिलाप करता जाता है, और एक बढ़ी हुई सद्भाव और अंतर्दृष्टि, एक बढ़ती हुई पूर्णता और शांति प्राप्त होती है।

सत्य के प्रति एक शक्तिशाली और बुलंद आकांक्षा के साथ-साथ दुःख, क्षण भंगुरता और जीवन के रहस्य का गहरा बोध होता है, और जब तक मन की यह स्थिति प्राप्त नहीं हो जाती तब तक ध्यान असंभव है। केवल चिंतन करना, या बेकार सपने देखने में समय व्यतीत करना ध्यान से बहुत दूर होना हैं।

रेवेरी (मन की लहर) को ध्यान समझना एक घातक त्रुटि

रेवेरी (Reverie मन की लहर) को ध्यान समझना एक आसान और घातक त्रुटि है जिससे ध्यान करने वाले को बचना चाहिए। दोनों में भ्रमित नहीं होना चाहिए; रेवेरी एक ढीला सपना है जिसमें एक आदमी गिर जाता है; ध्यान एक मजबूत, उद्देश्यपूर्ण सोच है जिसमें मनुष्य ऊपर उठता है। रेवेरी आसान और आनंददायक है; ध्यान पहली बार में कठिन और कष्टप्रद है।

आलस्य और विलासिता में रेवेरी पनपती है; तप और अनुशासन से ध्यान उत्पन्न होता है। रेवेरी पहले आकर्षक है फिर कामुक है। ध्यान पहले वर्जित है, फिर लाभदायक है और फिर शांतिपूर्ण है। रेवेरी खतरनाक है; यह आत्म-नियंत्रण को कमजोर करता है। ध्यान सुरक्षात्मक है; यह आत्म-नियंत्रण स्थापित करता है।
कुछ ऐसे संकेत हैं जिनके द्वारा कोई यह जान सकता है कि वह रेवेरी या ध्यान में संलग्न है या नहीं।

रेवेरी के संकेत हैं:

1. परिश्रम से बचने की इच्छा।

2. सपने देखने के सुख का अनुभव करने की इच्छा।

3. सांसारिक कर्तव्यों के प्रति बढ़ती अरुचि।

4. अपनी सांसारिक जिम्मेदारियों से बचने की इच्छा।

5. परिणामों का डर।

6. जितना हो सके कम से कम प्रयास से धन प्राप्त करने की इच्छा।

7. आत्म-नियंत्रण की कमी।

ध्यान के संकेत हैं:

1. शारीरिक और मानसिक दोनों ऊर्जा की वृद्धि।

2. ज्ञान के लिए एक ज़ोरदार प्रयास।

3. कर्तव्य के प्रदर्शन में चिड़चिड़ापन में कमी।

4. सभी सांसारिक जिम्मेदारियों को ईमानदारी से पूरा करने का एक निश्चित दृढ़ संकल्प।

5. भय से मुक्ति।

6. धन के प्रति उदासीनता।

7. आत्म-नियंत्रण का अधिकार।

कुछ निश्चित समय, स्थान और स्थितियां हैं जिनमें और जिनके तहत ध्यान करना असंभव है, अन्य जहां ध्यान करना मुश्किल है, और अन्य जहां ध्यान अधिक सुलभ हो जाता है; और इन्हें जान कर बड़े ध्यान से देखा जाना चाहिए;  वे इस प्रकार हैं:

समय, स्थान और परिस्थितियाँ जिनमें ध्यान असंभव है:

1. भोजन के समय या उसके तुरंत बाद।

2. सुख के स्थानों में।

3. भीड़-भाड़ वाली जगहों पर।

4. तेजी से चलते समय।

5. सुबह बिस्तर पर लेते हुए ।

6. धूम्रपान करते समय।

7. शारीरिक या मानसिक विश्राम के लिए सोफे या बिस्तर पर लेटते समय।

समय, स्थान और परिस्थितियाँ जिनमें ध्यान कठिन है:

1. रात में।

2. आलीशान ढंग से सुसज्जित कमरे में।

3. मुलायम सीट पर बैठे हुए ।

4. चटकीले कपड़े पहने हुए।

5. जब लोगों के साथ में हों।

6. जब शरीर थका हुआ हो।

7. अगर बहुत ज्यादा खाना खाया हुआ हो।

समय, स्थान और परिस्थितियाँ जिनमें ध्यान करना सर्वोत्तम है:

1. सुबह बहुत जल्दी।

2. भोजन से ठीक पहले।

3. एकांत में।

4. खुली हवा में या सादी साज-सज्जा वाले कमरे में।

5. सख्त आसन पर बैठकर ।

6. जब शरीर बलवान और उर्जावान हो।

7. जब शरीर शालीनता और सादे वस्त्रों से युक्त हो।

उपरोक्त निर्देशों से स्पष्ट है कि आराम, विलासिता और भोग (जो रेवेरी को प्रेरित करते हैं) ध्यान को कठिन बनाते हैं जबकि उत्साह, अनुशासन और आत्म-निषेध (जो रेवेरी को दूर करते हैं), ध्यान को तुलनात्मक रूप से आसान बनाते हैं। शरीर को भी न तो अधिक खाना चाहिए और न ही भूखा रहना चाहिए; न फटेहाल रहें और न ही भड़कीले कपड़े पहने। थकना नहीं चाहिए, बल्कि ऊर्जा और शक्ति के अपने उच्चतम बिंदु पर होना चाहिए, क्योंकि सूक्ष्म और उच्च विचार की एक केंद्रित श्रंखला में मन को पकड़ने के लिए उच्च स्तर की शारीरिक और मानसिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है।

अभीप्सा या तीव्र लालसा को अक्सर जगाया जाना अच्छा है और एक उच्च नियम, एक सुंदर वाक्य या कविता के एक पद के मानसिक दोहराव से मन को ध्यान में नवीनीकृत किया जा सकता है। वास्तव में, जो मन ध्यान के लिए तैयार है, वह सहज ही इस अभ्यास को अपना लेगा। केवल यांत्रिक दोहराव बेकार है और एक बाधा भी।

दोहराए गए शब्द किसी भी स्थिति पर इस प्रकार लागू होने चाहिए कि वे प्रेमपूर्वक और एकाग्र भक्ति के साथ रहें। इस प्रकार अभीप्सा और एकाग्रता एक साथ मिलकर बिना किसी अनावश्यक दबाव के ध्यान की अवस्था उत्पन्न करते हैं। ऊपर बताई गई सभी शर्तें ध्यान के शुरुआती चरणों में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, उनपर गौर से ध्यान दिया जाना चाहिए और उन सभी को विधिवत पालन करना चाहिए। जो अभ्यास कर रहे हैं; और जो ईमानदारी से निर्देशों का पालन करते हैं, जो प्रयास करते हैं और दृढ़ रहते हैं वे नियत समय में, पवित्रता, ज्ञान, आनंद और शांति की फसल को इकट्ठा करने में असफल नहीं होंगे; और निश्चय ही पवित्र ध्यान के मीठे फलों को चखेंगे।

अध्याय 8: समाप्त

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