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दुनिया में संघर्ष कैसे ख़त्म करें? एक आध्यात्मिक तरीका

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दुनिया में बहुत कलह व संघर्ष है। दुनिया के कई हिस्सों में बड़े पैमाने पर आपसी विवाद, आर्थिक संघर्ष, पर्यावरण विनाश, युद्ध और भूखमरी तथा अनियंत्रित शहरीकरण जैसी समस्याएँ पैर  पसारे  हुए  हैं। कभी-कभी ऐसा लगता है कि यह पृथ्वी निवास  के लिहाज़  से असहनीय -सी  जगह बन गई है। दिन ब दिन हम भारी आपदा की और बढ़ते हुए प्रतीत होते हैं। आशावाद एक महंगी वस्तु बन गया है। क्या दुनिया में इस संघर्ष से निजात का कोई आध्यात्मिक तरीका है?

महान आध्यात्मिक तरीके भी विफल रहे

इतिहास में झाँक कर हम पाते हैं कि विशाल अनुयायियों के साथ यहां कई महान नेता रहे हैं। व्यापक जन समुदाय से समर्थित नेताओं जैसे कि जूलियस सीज़र, अलेक्जेंडर, अब्राहम लिंकन, महात्मा गांधी, मार्टिन लूथर किंग जूनियर, चे ग्वेरा, नेल्सन मंडेला और कई अन्य जिन्होंने दुनिया में कलह-संघर्ष जनित दु:ख को घटाने की जीवन पर्यंत कोशिश की। बुद्ध, जीसस क्राइस्ट और मोहम्मद जैसे कई आध्यात्मिक, स्वामी और पवित्र लोग जिन्होंने इस संघर्ष को समाप्त करने के लिए प्रार्थना, प्रवचन , आध्यात्मिक तरीकों या धर्मों की स्थापना की।

विडंबना यह है कि संघर्ष के खतरे से लड़ने के लिए भी कई युद्ध हुए हैं, हां, शांति के लिए युद्ध! लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। हम पाते हैं कि इस “आधुनिक और सभ्य” दुनिया का परिदृश्य बद से बदतर हो गया है। जाहिर है, अतीत और वर्तमान के महान लोग भी संघर्ष को समाप्त करने में नाकाम रहे हैं।
क्या उनके सारे धर्म-आध्यात्मिक तरीके पूर्ण सद्भाव स्थापित करने में असफल रहे, कलह -संघर्ष को नहीं जीत पाए?

क्या कोई आशा नहीं बची है?

आध्यात्मिक नज़र से यह निश्चित रूप से एक गंभीर स्थिति लगती है, हालांकि, आशा की एक किरण है चमक है एक शब्द ‘मैं’ में। जी हाँ , वह शब्द “मैं” ही है। तो तुरंत एक सवाल उठता है कि इस आखिर इस शब्द में इतना खास क्या है। हम इसे दिन में दर्ज़नों बार उपयोग करते हैं। और यह उन मुद्दों को कैसे हल करता है जिन्हें हम वर्तमान में सामना कर रहे हैं?
इसका जवाब हमारी आध्यात्मिक आंख खोलने में है और फिर “मैं” को देखना है। यह वह शब्द है जो अति घृणास्पद या महानतम हो सकता हैं यह आपके देखने के (आध्यात्मिक) तरीके पर निर्भर है|

“मैं” की समस्या है–दो तरफा होना

एक ओर, “मैं” आपका भारी-भरकम अहंकार हो सकता है जो दुनिया को अपने तरीके में ढालना चाहता है। यदि चीजें इसके अनुसार नहीं हैं, तो आप दुनिया में कलह, संघर्ष, विनाश और युद्ध देखेंगे। जब इस “मैं” की इच्छा पूरी नहीं होती है, तो यह दुनिया में भूख और वासना को देखता है। इस निरंतर संघर्ष ने हमारे इतिहास पर अपना छाप छोड़ी है। इसके सबूत अफ्रीकी देशों में गृहयुद्ध, हिटलर के राक्षसी कृत्यों, विश्व युद्धों और हाल के वर्षों में आईएसआईएस और सीरिया संकट में स्पष्ट हैं। ये सभी संघर्ष हमें आध्यात्मिक मार्ग से भटक जाने का संकेत देते हैं।

संयोगवश यहां बताया गया कि कैसे दुर्योधन नामक व्यक्ति के महाअहंकार के कारण मानव जाति के इतिहास में सबसे महान युद्धों में से एक हुआ है: महाभारत युद्ध

आध्यात्मिकता डूबती ही जा रही है

यह “मैं” सात घातक पापों की के नरक में गहराई से डूब गया है: घमंड, लालच, वासना, ईर्ष्या, लोलुपता , क्रोध और आलस के पाप। यह आध्यात्मिक मार्ग पर नहीं है, बल्कि यह अनेक पोतड़ों में लपेटा गया है और हमारी इंद्रियों के पीछे मुहर लगाकर रखा गया है। ये पापी इंद्रियां लगातार संतुष्टि को तलाश करती हैं और इस तरह “मैं” गहरी और गहरी खाई डूब जाता है। इस वज़ह से उन आवरणों और मुहरों को मज़बूती मिलाती है एवं उन्हें तोड़ना और भी दुश्वार हो जाता है| और “मैं” इसी प्रकार आध्यात्मिक राह खो खोकर भटकता रहता है
तो जब आप अकाल और बाढ़, असंतोष, कलह,  संघर्ष, युद्ध और विनाश देखते हैं, तो यह उस ” मैं” की आंखों के माध्यम से होता है।

आप जो देखते हैं वही आप हैं

सात पापपूर्ण आवरणों ने आपकी सभी इंद्रियों को लपेट लिया है और सील कर दिया है। इसलिए, यदि आप देखते हैं कि आपकी दुनिया इतनी दुखी और परेशान पहेली है, तो यह आप हैं जो इतने लपेटे हुए, मुहरबंद और घुमावदार स्वयं हैं जो परेशान पहेली है। यदि आप सभी प्रकार की दुखी कहानियों को सुनते हैं, तो वास्तव में, वे केवल आपके द्वारा बोली जाती हैं–आपके मुंह से कई परतों में लिपटे, सीलबंद और सात आवरणों के पीछे छिपी हुई ज़बान के द्वारा हैं। देखने का एकमात्र तरीका है – आध्यात्मिक तरीका।
यदि आप कुछ बदसूरत देखते हैं तो यह आप हैं जो बदसूरत हैं, केवल आपकी आंखें, वे ही प्रथम और अंतिम सत्य हैं| जब कोई आपको कठोर बोलता है तो आप याद रखें, यह केवल आप ही है। यही आपकी अप्रत्यक्ष और मुहरबंद जीभ है–इसे देंखें और कलह-संघर्ष के कड़वे स्वाद को धोने के लिए।

जिस तरह से चीजें आपको प्रकट होती हैं उससे ज़ाहिर होता है की आप आध्यात्मिक राह पर कहाँ हैं। दुनिया को अपने भयानक आवरणों को, जिन्हें आप देखते हैं, छोड़ने के लिए मत कहें। चीजों को बदलने के लिए समय बर्बाद न करें| वे जो कुछ भी कर रहे हैं उसके लिए ठीक हैं।

पोतड़े  मुहरें और परदे  हटाएं, फिर देखें

यह आप हैं जिन्हें खुद को खोलने और अनावरण करने की आवश्यकता है और दुनिया स्वयं खुलकर और अनावरण करेगी। अपनी आत्मा पर उन मुहरों को तोड़ दो तो फिर बाहरी चीजें भी अपनी मुहरों को खुद तोड़ देंगी।

“चीजें को अकेले रहने दें और उन्हें बदलने के लिए श्रम न करें| चीज़ें जैसी वे प्रतीत होती उसका कारण आप जैसे है वही देख रहे हैं|” –किताब-ए-मिरदाद

इसलिए, आपको केवल खुद को देखना चाहिए और केवल आपको ही सुने। क्योंकि सभी चीजों में और सभी चीजों से परे यह केवल आप और आप ही हैं। सभी शब्दों में और सभी शब्दों से परे, पुन:, यह केवल आप ही है। आप दृष्टा हैं, आप वक्ता हैं और आप ही सृजक व निर्माता हैं। कलह-संघर्ष को समाप्त करने का यही एकमात्र आध्यात्मिक तरीका है।
इस प्रकार अपने पोतड़ों को उधेड़ने, इंद्रियों जनित आवरण हटाने तथा मुहरों को तोड़ने की कुंजी उस शब्द में निहित है जिसे आप हर समय कहते हैं- वह शब्द है “मैं”।

परमात्मा का अंशरुपी बीज आपके दिल की गहराई में दफ़न है

जिस तरह से आप इसका इस्तेमाल करते हैं “मैं” वही है: एक तरफ यह भारी अहंकार में लिपटा, सीलबंद और इन्द्रिय आवरण के पिछे हो सकता है अथवा “मैं” आपका प्रबुद्ध आत्म हो सकता है – परमात्मा का अंशरुपी बीज आपके दिल की गहराई में दफ़न जो है|

आध्यात्मिक मार्ग स्पष्ट होने पर यह बीज अंकुरित करने के लिए कड़ी मेहनत कर रहा है। फिर यह अंततः एक हरे-भरे परिपक्व पेड़ के रूप में बढ़ कर निकलता है जो सबको अपने मीठे फल और बिना शर्त प्यार देता है। सभी में निष्पक्ष रूप से , स्वतंत्र रूप से बिना शर्त प्यार फैलाता है। इस तरह दुनिया बदलती है, आप भगवान के साथ विलय करते हैं जो आप ही हैं, आपका सच्चा गौरवशाली आत्म। तब वहां कोई संघर्ष और कलह नहीं होता है, वहां कोई युद्ध और विनाश भी नहीं होता है। वास्तव में, वे सब आपके उस “मैं” के अंदर थे, असली “मैं” को तो पोतड़ों से लपेटा गया था, सील कर दिया गया था और घातक इच्छाओं से घिरा हुआ था। इस दुनिया में कटुता कलह एवं संघर्ष समाप्त करने का यही एकमात्र आध्यात्मिक तरीका है|

“इंसानों के रूप में, हमारी महानता दुनिया को पुन:निर्माण करने की क्षमता में इतनी नहीं बल्कि स्वयं को नवीन बनाने में  ज्यादा निहित है। “~ गांधी

अब आपकी बारी है” अपनी मुहरों को तोड़ो और  पड़े पर्दों को हटाकर अपने “मैं” को पूरी महिमा में प्रकट करने के लिए अनावरण करें। इस प्रकार इस दुनिया में संघर्ष, कलह, झगड़े-फसादों को खत्म करने में मदद करें। यह भी एक प्रकार का संघर्ष है: आत्म-संघर्ष| 

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