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एकाग्रता का विकास

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जेम्स एलेन (James Allen) की प्रसिद्ध कृति “भाग्य पर महारत” (Mastery of Destiny) का स्वतंत्र हिंदी अनुवाद, अध्याय 7: एकाग्रता का विकास (Cultivation of Concentration)

एकाग्रता क्या है?

किसी भी कार्य की सिद्धि के लिए एकाग्रता, या मन को एक केंद्र में लाना और उसे वहीं रखना अत्यंत आवश्यक है। यह संपूर्णता का पिता और उत्कृष्टता की जननी है। एक क्षमता के रूप में, यह अपने आप में एक अंत नहीं है, बल्कि सभी संकायों, सभी कार्यों के लिए एक सहायता है। यह अपने आप में कोई उद्देश्य नहीं है, पर एक ऐसी शक्ति है जो सभी उद्देश्यों को पूरा करती है। यांत्रिकी में भाप की तरह, यह मन की मशीनरी और जीवन के कार्यों में एक गतिशील शक्ति है।

प्रत्येक सफल व्यक्ति, चाहे उसकी सफलता किसी भी दिशा में हो, एकाग्रता का अभ्यास करता है, भले ही वह अध्ययन के विषय के रूप में इसके बारे में कुछ भी नहीं जानता हो; हर बार जब कोई किसी पुस्तक, कार्य या भक्ति में लीन हो जाता है या कर्तव्य में परिश्रम करता है तो किसी न किसी मात्रा में एकाग्रता सामने आती है।

एकाग्रता कुछ करने में सहायता है, यह अपने आप में कुछ करना नहीं है। सीढ़ी का अपने आप में कोई महत्व नहीं है, लेकिन केवल उस हद तक जहां तक ​​यह हमें किसी ऐसी चीज तक पहुंचने में सक्षम बनाती है जिस तक हम अन्यथा नहीं पहुंच सकते। इसी तरह, एकाग्रता वह है जो मन को कुछ आसानी से पूरा करने में सक्षम बनाती है जिसे पूरा करना अन्यथा असंभव होगा लेकिन अपने आप में एक मरी हुई चीज है और एक जीवित उपलब्धि नहीं है।

एकाग्रता जीवन के उपयोगों के साथ इस प्रकार गुंथी हुई है कि इसे कर्तव्य से अलग नहीं किया जा सकता है और वह जो अपने कार्य, अपने कर्तव्य के अलावा इसे हासिल करने का प्रयास करता है, वह न केवल असफल होगा, उसकी मानसिक नियंत्रण और कार्यकारी क्षमता, कमतर हो जाएगी। सभी कार्यों में एकाग्रता की साधना के साधन हैं–चाहे कार्य दैवीय ज्ञान प्राप्त करना हो, या एक फर्श की सफाई करना हो – क्योंकि जो करना है उसे करने के लिए एकाग्रचित्त मन को एक अच्छी तरह से नियंत्रित करने के अलावा क्या है?

वह जो अपने काम को , जल्दबाजी, लक्ष्यहीन या विचारहीन तरीके से करता है, और अपनी कृत्रिम “एकाग्रता विधियों” का सहारा लेता है – वह मन की स्थिरता में वृद्धि नहीं करेगा। एक बिखरी हुई और अनुशासनहीन सेना बेकार होगी। इसे कार्रवाई में प्रभावी और जीत में तेज बनाने के लिए इसे ठोस रूप से केंद्रित और उत्कृष्ट रूप से निर्देशित किया जाना चाहिए। बिखरे हुए विचार कमजोर और बेकार हैं। किसी दिए गए बिंदु पर एकत्रित किए गए, आदेशित और निर्देशित विचार अजेय हैं; उनके कुशल दृष्टिकोण से भ्रम, संदेह और कठिनाई समाप्त हो जाती हैं। एकाग्रचित्त विचार बड़े पैमाने पर सभी सफलताओं में और सभी जीत में पाया जाता है।

एकाग्रता की शुरुआत

किसी अन्य उपलब्धि की तुलना में इस उपलब्धि के बारे में और कोई रहस्य नहीं है, क्योंकि यह सभी विकास, अर्थात् अभ्यास के अंतर्निहित सिद्धांत द्वारा शासित है। किसी काम को करने में सक्षम होने के लिए, आपको उसे करना शुरू करना चाहिए, और तब तक करते रहना चाहिए जब तक कि उस चीज़ में महारत हासिल न हो जाए। यह सिद्धांत सार्वभौमिक रूप से प्रचलित है- सभी कलाओं, विज्ञानों, व्यापारों में; सभी विद्या, आचरण, धर्म में। पेंट करने में सक्षम होने के लिए, किसी को पेंट करना होगा; यह जानने के लिए कि किसी उपकरण का कुशलता से उपयोग कैसे किया जाए, उसे उपकरण का उपयोग करना चाहिए; सीखने के लिए, उसे सीखना चाहिए; बुद्धिमान बनने के लिए उसे बुद्धिमानी से काम करना होगा; और अपने मन को सफलतापूर्वक एकाग्र करने के लिए उसे एकाग्र करना होगा। लेकिन करना ही सब कुछ नहीं है – इसे ऊर्जा और बुद्धि के साथ किया जाना चाहिए।

तो, एकाग्रता की शुरुआत है, अपने दैनिक कार्य पर जाना और उस पर अपना दिमाग लगाना, अपनी सारी बुद्धि और मानसिक ऊर्जा को उस पर केंद्रित करना जो करना है; और हर बार जब विचार लक्ष्यहीन रूप से भटकते हुए पाए जाते हैं, तो उन्हें तुरंत वापस काबू में ले लेकर काम पर लगाया जाना चाहिए।

इस प्रकार जिस “केंद्र” पर आपको अपने मन को लाना है, वह कार्य जो आप प्रतिदिन कर रहे हैं; और इस प्रकार ध्यान केंद्रित करने में आपका उद्देश्य अपने काम को सुचारू रूप से तेजी और पूर्ण कौशल के साथ करने में सक्षम होना है; क्योंकि जब तक तुम इस प्रकार अपना काम नहीं कर लेते, तब तक तुमने मन पर किसी भी हद तक नियंत्रण हासिल नहीं किया है; आपने एकाग्रता की शक्ति हासिल नहीं की है।
विचार, ऊर्जा और इच्छाशक्ति का यह शक्तिशाली ध्यान पहली बार में मुश्किल है क्योंकि कुछ भी हासिल करने लायक हमेशा मुश्किल होता है लेकिन दैनिक प्रयास, कड़ी मेहनत और धैर्य से जल्द ही आप किसी भी काम को करने के लिए एक मजबूत और मर्मज्ञ दिमाग लगाने में सक्षम बनेंगे ; एक दिमाग जो काम के सभी विवरणों को जल्दी से समझ लेगा और सटीकता के साथ उनका निपटारा करेगा।

एकाग्रता की प्रक्रिया

इस प्रकार, जैसे-जैसे किसी की एकाग्रता क्षमता बढ़ती है, हर चीजों में उसकी उपयोगिता बढ़ती है, और दुनिया में उसका मूल्य बढ़ता है, इस प्रकार अच्छे अवसर आमंत्रित होते है और उच्च कर्तव्यों के द्वार खुलते हैं ; अंतत: वह एक व्यापक और पूर्ण जीवन के आनंद का भी अनुभव करेगा। एकाग्रता की प्रक्रिया में निम्नलिखित चार चरण होते हैं:

1. ध्यान 2. चिंतन 3. अमूर्तता 4. आराम में गतिविधि

पहले तो विचार रुक जाते हैं और मन विषय पर स्थिर हो जाता है, जो हाथ में काम है- यही ध्यान है। कार्य के साथ आगे बढ़ने के तरीके के बारे में मन तब जोरदार उत्तेजित होता है– यह चिंतन है।

लंबे समय तक चिंतन मन की एक ऐसी स्थिति की ओर ले जाता है जिसमें इंद्रियों के दरवाजे बाहरी विकर्षणों के प्रवेश द्वार के खिलाफ बंद हो जाते हैं, विचारों को लपेटा जाता है, और पूरी तरह से और गहन रूप से काम पर केंद्रित होता है – यह अमूर्तता है। इस प्रकार गहन चिंतन में केन्द्रित मन एक ऐसी अवस्था में पहुँच जाता है जिसमें न्यूनतम घर्षण के साथ अधिकतम कार्य किया जाता है– यह विश्राम में गतिविधि है।

ध्यान सभी सफल कार्यों में पहला चरण है। जिनके पास इसकी कमी होती है वे हर चीज में असफल होते हैं वे हैं आलसी, विचारहीन, उदासीन और अक्षम। जब ध्यान के बाद मन को गम्भीर चिन्तन की ओर जाग्रत किया जाता है, तब दूसरी अवस्था पहुँच जाती है। सभी सामान्य, सांसारिक उपक्रमों में सफलता सुनिश्चित करने के लिए, इन दो चरणों से आगे जाना आवश्यक नहीं है। और केवल एक तुलनात्मक रूप से लोगों की एक छोटी संख्या ही अमूर्तता के तीसरे चरण तक पहुँचती है क्योंकि जब अमूर्तता पहुंच जाती है, तो हम प्रतिभा के क्षेत्र में प्रवेश कर चुके होते हैं।

पहले दो चरणों में, काम और दिमाग अलग-अलग होते हैं, और काम कमोबेश श्रमसाध्य और कुछ हद तक घर्षण के साथ किया जाता है लेकिन तीसरे चरण में, मन के साथ काम का एक संलयन होता है, एक मिलन होता है, और दोनों एक हो जाते हैं: तब कम श्रम और घर्षण के साथ एक बेहतर दक्षता होती है। पहले दो चरणों की पूर्णता में, मन वस्तुपरक रूप से लगा रहता है, और बाहरी दृश्यों और ध्वनियों द्वारा अपने केंद्र से आसानी से खींच लिया जाता है; लेकिन जब मन ने अमूर्तता में पूर्णता प्राप्त कर ली है तो काम करने की व्यक्तिपरक (आत्मनिष्ठ ) विधि प्राप्त हो जाती है जोकि वस्तुपरक (विषयनिष्ठ) विधि से अलग है।

विचारक तब बाहरी दुनिया से बेखबर होता है, लेकिन अपने मानसिक कार्यों में जीवंत रूप से जीवित रहता है। यदि उस से कुछ कहा जाए तो वह नहीं सुनेगा और यदि वह अधिक प्रबल अपील के साथ किया जाता है तो वह अपने मन को बाहर की बातों में वापस लाएगा, जैसे कि एक सपने से बाहर आ रहा है; निश्चय ही यह अमूर्तन एक प्रकार का जाग्रत स्वप्न है, परन्तु स्वप्न से इसकी समानता आत्मपरक अवस्था से समाप्त हो जाती है : स्वप्न की भ्रांति के स्थान पर पूर्ण क्रम होता है, मर्मज्ञ अंतर्दृष्टि और समझ की एक विस्तृत श्रृंखला। जो कोई अमूर्तता में पूर्णता प्राप्त कर लेता है, वह उस विशेष कार्य में प्रतिभा प्रकट करेगा जिस पर उसका मन केंद्रित है।

आविष्कारक, कलाकार, कवि, वैज्ञानिक, दार्शनिक और सभी प्रतिभाशाली व्यक्ति अमूर्त व्यक्ति हैं वे कार्यों को व्यक्तिपरक रूप से और आसानी से पूरा करते हैं, लेकिन वे पुरुष जो अभी तक एकाग्रता में दूसरे चरण से आगे नहीं पहुंचे हैं वे कठिन श्रम के बिना पूरा नहीं कर सकते हैं।

जब चौथा चरण – विश्राम में गतिविधि का – प्राप्त किया जाता है, तब इसकी पूर्णता में एकाग्रता प्राप्त होती है। मुझे एक भी ऐसा शब्द नहीं मिला जो स्थिरता, या आराम के साथ संयुक्त गहन गतिविधि की इस दोहरी स्थिति को पूरी तरह से व्यक्त कर सके, और इसलिए “गतिविधि में आराम” शब्द को इस्तेमाल किया है।

यह शब्द विरोधाभासी प्रतीत होता है, लेकिन एक घूमते हुए लट्टू का सरल चित्रण विरोधाभास को समझाने का काम करेगा। जब एक लट्टू अधिकतम वेग से घूमता है, तो घर्षण कम से कम हो जाता है, और वह पूर्ण विश्राम की स्थिति ले लेता है जो कि देखने में बहुत सुंदर और मन को इतना लुभावना लगता है कि स्कूली छात्र इसे देखकर कहते हैं कि लट्टू “सो” गया है।

लट्टू जाहिरा तौर पर गतिहीन है लेकिन यह आराम है, जड़ता में नहीं, बल्कि तीव्र और पूरी तरह से संतुलित गतिविधि में आराम है। तो जिस मन ने पूर्ण एकाग्रता प्राप्त कर ली है, जब वह विचार की उस गहन गतिविधि में लगा होता है जिसके परिणामस्वरूप उच्चतम प्रकार का उत्पादक कार्य होता है, मूक संतुलन और शांत विश्राम में होता है। बाह्य रूप से, कोई स्पष्ट गतिविधि नहीं है, कोई अशांति नहीं है, और इस शक्ति को प्राप्त करने वाले व्यक्ति का चेहरा
दीप्तिमान शांति ( radiant calmness )से जग मग करेगा, और जब मन सक्रिय विचार में सबसे अधिक तीव्रता से संलग्न होगा तो चेहरा उदात्त रूप से शांत ( sublimely calm ) होगा।

एकाग्रता के प्रत्येक चरण की अपनी विशेष शक्ति होती है। इस प्रकार पहला चरण जब सिद्ध हो जाता है तो  उपयोगिता की ओर ले जाता है; दूसरा कौशल, क्षमता, प्रतिभा की ओर जाता है; तीसरा मौलिकता और अपूर्व बुद्धि की ओर जाता है; जबकि चौथा दक्षता और शक्ति की ओर ले जाता है और मनुष्यों को लीडर और उपदेशक बनाता है।

एकाग्रता के विकास में, विकास की सभी वस्तुओं की तरह, अन्य चरण पिछले चरणों में पूरी तरह से शामिल होते हैं। इस प्रकार चिंतन में, ध्यान निहित है; अमूर्तता में ध्यान और चिंतन दोनों सन्निहित हैं; और जो अंतिम चरण में पहुंच गया है, वह चिंतन में सभी चार चरणों में होता है।

जिसने अपने आप को एकाग्रता में सिद्ध कर लिया है, वह किसी भी क्षण, किसी भी विषय पर अपने विचारों को एक बिंदु पर लाने में सक्षम है, और एक सक्रिय समझ के तेज प्रकाश के साथ उसकी खोज करने में सक्षम है। उसने सीख लिया है कि कैसे अपनी सोच क्षमताओं का उपयोग निश्चित उद्देश्यों के लिए किया जाए और उन्हें निश्चित लक्ष्यों की ओर निर्देशित किया जाए। वह चीजों को बुद्धिमानी से करता है और न कि अराजक विचारों के बीच कमजोर पथिक की तरह।

निर्णय, ऊर्जा, सतर्कता साथ ही विचार-विमर्श, न्याय और गंभीरता, ये एकाग्रता की आदत के साथ आते हैं; और वह ज़बदस्त मानसिक प्रशिक्षण सांसारिक व्यवसायों में लगातार बढ़ती उपयोगिता और सफलता से होते हुए , “ध्यान” नामक एकाग्रता के उस उच्च रूप की ओर ले जाता है जिसमें मन दिव्य रूप से प्रकाशित होता है और अलौकिक ज्ञान प्राप्त करता है।

अध्याय 7: समाप्त

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