युद्ध की कला 8: युद्ध नीति में बदलाव

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सैन्य रणनीतिकार सून त्ज़ु ने अध्याय 8 में कहा है: युद्ध में, सेनापति शासक से अपने आदेश प्राप्त कर अपनी सेना इकट्ठा करके उसे केंद्रित करता है। जब मुश्किल देश में हों तो वहाँ पड़ाव न डालें। देश में जहां ऊंची सड़कें आपस में मिलती हों वहाँ अपने सहयोगियों के साथ हाथ मिलाएं। खतरनाक रूप से अलग-थलग स्थिति में न रहें। घेराव की स्थितियों में, आपको युक्ति या चातुर्य का सहारा लेना चाहिए। हताश स्थिति में आपको लड़ना होगा। कुछ ऐसी सड़कें होती हैं जिन पर आगे नहीं बढ़ना चाहिए, ऐसी सेनाएँ होती हैं जिन पर हमला नहीं किया जाना चाहिए, कुछ ऐसे कस्बे होते हैं जिनको घेरना नहीं चाहिए, ऐसे स्थान/स्थिति होती हैं जिन पर दावा नहीं करना चाहिए, प्रभुसत्ता/शासक के कुछ आदेशों का भी पालन नहीं किया जाना चाहिए।

ऐसा कमांडर जो रणनीति में बदलाव करने से होने वाले फायदों को अच्छी तरह से समझता है वह जानता है कि अपने सैनिकों को कैसे संभालना है। जो सेनापति इनको नहीं समझता है, चाहे वह चाहे देश की समस्त व्यवस्था से अच्छी तरह परिचित हो फिर भी वह अपने ज्ञान को व्यवहारिकता में नहीं बदल सकेगा। इसलिए युद्ध का वो छात्र जो युद्ध की कला में रणनीति में बदलाव का महत्व नहीं समझता है , भले ही वह पांच लाभों से परिचित हो, अपने सैनिकों का बेहतर उपयोग करने में विफल हो जाएगा। इसलिए बुद्धिमान नेता की योजनाओं में, लाभ और नुकसान के विचारों को एक साथ रख कर परखा जाता है।

अगर इस तरह की कार्य द्वारा हमारे लाभ की उम्मीद बनाती है तो हम अपनी योजनाओं के आवश्यक हिस्से को पूरा करने में सफल हो सकते हैं। और कठिनाइयों के बीच हम हमेशा एक फायदा उठाने को तत्पर रहते हैं तो हम खुद को दुर्भाग्य से बाहर निकाल सकते हैं।  शत्रुतापूर्ण सरदारों को नुकसान पहुंचाकर उन्हें कम करें, उनके लिए मुसीबत खड़ी करें और उन्हें लगातार उलझाए रखें ; दिखावटी प्रलोभन देकर उन्हें किसी स्थान की और भगाएँ। युद्ध की कला हमें दुश्मन के न आने की संभावना पर भरोसा नहीं करना है बल्कि उसका मुकाबला करने हेतु हमारी तत्परता रखना सिखाती है ; उसके हमला न करने के संभावना पर ध्यान देने की बजाय इस तथ्य पर कि हमने अपनी स्थिति को अभेद्य बना दिया है।

पांच खतरनाक दोष हैं जो एक सेनापति को प्रभावित कर सकते हैं: (1) लापरवाही, जो विनाश की ओर ले जाती है; (2) कायरता, जो कैद की ओर ले जाती है; (3) तुनुकमिजाजी या  त्वरित गुस्सा,  जो अपमान द्वारा उकसाया जा सकता है; (4) सम्मान की दुर्बलता, जो शर्म के प्रति संवेदनशील है (5) अपने सिपाहियों की सरपरस्ती, जो उसे चिंता और परेशानी में डाल सकती है। ये सेनापति के पांच ऐसे पाप हैं जो युद्ध के संचालन में विनाशकारी हैं। जब एक सेना को उखाड़ फेंका जाता है और उसके नेता मारा जाता है तो निश्चित रूप से इन पाँच खतरनाक दोषों में ही इसका कारण पाया जाएगा। उन्हें ध्यान का विषय बनाएं।

अध्याय 8 : समाप्त 

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