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युद्ध की कला 3: युक्ति द्वारा हमला

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सैन्य रणनीतिकार सून त्ज़ु ने अध्याय 3 में कहा है: युद्ध की व्यावहारिक कला में, सबसे अच्छा काम दुश्मन के देश को पूरी तरह से और अक्षुण्ण रूप से  कब्ज़े में करना है; उसे चकनाचूर करना और नष्ट करना उचित नहीं है। इसलिए किसी सेना, पलटन, टुकड़ी या कंपनी को नष्ट करने के बजाय उसे पूरी तरह  बंदी बनाना बेहतर है। इसलिए अपनी सभी लड़ाइयों में लड़कर जीतना कोई महान कार्य नहीं है; बल्कि युद्ध के बिना ही शत्रु को बेतरतीब कर देना ही महानतम कार्य है।

युद्ध के बिना ही शत्रु को कब्ज़े में ले लेना

इस प्रकार सेना संचालन का सर्वोच्च उद्देश्य दुश्मन की योजनाओं को नाकाम करना है; अगला सबसे अच्छा कदम है- दुश्मन के बलों को एकत्रित होने से रोकना ; फिर मैदान में दुश्मन की सेना पर हमला करना है। और सबसे खराब नीति नगर कोट का घेराव करना है। नियम यह है कि, अगर इसे संभवतः टाला जा सकता है तो, दीवार वाले शहरों को घेरना नहीं है। आवरण चढ़ाना, चलायमान आश्रयों और युद्ध के विभिन्न उपकरणों की तैयारी में पूरे तीन महीने लगेंगे और दीवारों के विपरीत टीले खड़े करने में तीन महीने और लगेंगे।

अपनी चिढ़ को नियंत्रित करने में असमर्थ सेनापति यदि अपने सिपाहियों को चींटियों के झुंड की तरह मैदान में कुदाएगा, तो परिणामस्वरूप उसके एक तिहाई लोग मारे जाएंगे, जबकि शहर तब भी अछूता रहेगा। इस तरह की घेराबंदी के विनाशकारी प्रभाव होते हैं। इसलिए एक कुशल नेता बिना किसी लड़ाई के दुश्मन के सैनिकों को अपने अधीन कर लेता है; वह उनके नगरों की घेराबंदी किए बिना उन्हें कब्ज़े में ले लेता है; वह मैदान में लंबे अभियान के बिना दुश्मन के राज्य को उखाड़ फेंकता है।

अपने बलों को बरकरार रखकर वह विपक्षी साम्राज्य के प्रभुत्व को चुनौती देगा, और इस तरह, एक भी सिपाही को खोए बिना, उसकी जीत हो जाएगी। यह युक्ति द्वारा हमला करने की विधि है।

युद्ध के नियम

अगर हमारी सेना दुश्मन सेना से दस गुना है, तो उसे घेर लेना चाहिए; अगर हम पांच गुना है तो उस पर हमला करें; अगर हमारी सेना दो गुना ही है तो हमारी सेना को दो में विभाजित कर देना चाहिए। यदि हमारा सेना बल समान है तो हम युद्ध की पेशकश कर सकते हैं; यदि हम संख्याओं में थोड़ा कम है तो हमें दुश्मन से बचना चाहिए; अगर हम हर तरह से काफी नीचे या हीन हैं  तो हमें भाग निकलना चाहिए।

हालाँकि एक छोटे से सैन्य  बल द्वारा एक जिद्दी लड़ाई की जा सकती है पर अंत में इसे बड़े बल द्वारा पकड़ लिया जाएगा। चूंकि सेनापति राज्य का रक्षा कवच होता है; यदि रक्षा कवच सभी मामलों में खरा उतरता है तो राज्य मजबूत होगा; यदि यह दोषयुक्त होता है तो राज्य कमजोर होगा।

एक शासक अपनी सेना पर तीन तरीके से दुर्भाग्य का कहर ढा सकता है: 

  1. सेना उसके आदेश का पालन नहीं करेगी–इस तथ्य से अनभिज्ञ होकर, सेना को आगे बढ़ने या पीछे हटने की आज्ञा देना। इसे सेना की कमर तोड़ना कहते हैं।
  2. सेना की  स्थितियों से अनभिज्ञ होने के नाते, सेना पर शासन करने का प्रयास उसी तरह से करना, जैसे वह राज्य पर करता है। इससे सैनिकों के मन में बेचैनी पैदा होती है।
  3. परिस्थितियों के अनुकूलन  के सैन्य सिद्धांत के अज्ञान से, बिना विवेक बुद्धि के अपनी सेना के अधिकारियों को नियुक्त करना। यह सैनिकों के आत्मविश्वास को हिला देता है।

लेकिन जब सेना बैचेनी और अविश्वास की स्थिति में है तो विरोधी राजा मुसीबत ज़रूर पैदा करेंगे। इससे सेना में अराजकता फ़ैल जाती है और जीत की संभावना दूर हो जाती है।

इस प्रकार हम जान सकते हैं कि जीत के लिए पाँच आवश्यकताएं है: (1) वह जीतेगा जो जानता है कि कब लड़ना है और कब नहीं लड़ना है। (2) वह जीतेगा जो बेहतर और हीन दोनों शक्तियों को संभालना जानता है। (3) वह जीत जाएगा जिसकी सेना के सभी पदों में समान भावना से जोश भरा हुआ है। (4 वह जीतेगा जिसने खुद को पहले से तैयार किया हुआ है और बिना तैयारी वाले दुश्मन पर हमला करने का इंतजार करता है। (5) वह जीतेगा जिसके पास सैन्य क्षमता है और जिसका शासक उसके साथ हस्तक्षेप नहीं करता है।

इसलिए कहावत: यदि आप दुश्मन को और खुद को जानते हैं, तो आपको सौ लड़ाइयों के परिणाम से डरने की जरूरत नहीं है। यदि आप खुद को जानते हैं, लेकिन दुश्मन को नहीं; तो हर जीत के बदले आपको एक हार का भी सामना करना पड़ेगा। यदि आप न तो दुश्मन और न ही खुद को जानते हैं तो आप हर लड़ाई में दम तोड़ देंगे।

अध्याय 3: समाप्त

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