युद्ध की कला 9: सेना का मार्च करना 

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सैन्य ज्ञान की चार उपयोगी शाखाएँ

सैन्य रणनीतिकार सून त्ज़ु ने अध्याय 9 में कहा है: अब हम सेना का पड़ाव डालने और दुश्मन के संकेतों को देखने के सवाल पर आते हैं। पहाड़ों पर से तेज़ी से गुज़र जाएं और घाटियों के निकट रहें। ऊंचे स्थानों पर सूर्य के सामने शिविर लगाएं। लड़ने के लिए ऊंचाइयों पर न चढ़ें। पहाड़ी लड़ाई के लिए इतना ही।

किसी नदी को पार करने के बाद, आपको उससे बहुत दूर चले जाना चाहिए। जब एक आक्रमणकारी  सेना अपने मार्ग में एक नदी को पार करती है तो उससे  मध्य-धारा में लड़ने के लिए आगे न बढ़ें। उनकी आधी सेना पार करने के बाद उन पर हमला करना सबसे अच्छा होगा।  यदि आप लड़ने के लिए उत्सुक हैं तो नदी के पास, जिसे आक्रमणकारी को पार करना है, वहाँ शत्रु से भिड़ने नहीं जाना चाहिए। अपने जहाज़ को दुश्मन की तुलना में अधिक ऊपर बेड़ा डालकर सूर्य के सामने रखें। शत्रु से भिड़ने के लिए प्रवाह के ऊपर मत जाएँ।  नदी युद्ध के लिए इतना काफी ।

नमकीन दलदल को पार करने में आपकी एकमात्र चिंता ये हो कि बिना किसी देरी के उनके पार कैसे निकला जाए। यदि नमक के दलदल में लड़ने के लिए मजबूर किया जाए, तो आपके निकट पानी और घास होनी चाहिए, और पेड़ों के झुरमुटों पर आपकी पीठ होनी चाहिए। नमकीन -दलदल में युद्ध संचालन के लिए यही काफी हैं।

शुष्क, समतल प्रदेश में, आसानी से सुलभ ऐसी स्थिति पर रहें  कि अपने दायीं और अपने पीछे की तरफ ऊपर उठती हुई ज़मीन हो, ताकि खतरा सामने हो और सुरक्षा पीछे रहे। सपाट देश में युद्ध संचालन के लिए इतना ही काफ़ी। ये सैन्य ज्ञान की चार उपयोगी शाखाएँ हैं जिन्होंने एक सम्राट को कई देशों को जीतने में सक्षम बनाया।

सैनिकों व जमीन के प्राकृतिक लाभों का उपयोग

सभी सेनाएँ नीची की बजाय ऊँची, अँधेरे की बजाय धूप वाली जगहों को पसंद करती हैं। यदि आप अपने सिपाहियों के प्रति सावधान रहते हैं और कठोर ज़मीन पर डेरा डालते हैं तो सेना हर तरह की बीमारी से मुक्त हो रहेगी और इससे जीत हासिल होगी। जब आप एक पहाड़ी या किनारे पर आते हैं, तो अपने पिछवाड़े के दाहिने ओर ढलान के साथ, धूप वाली जगह पर कब्जा करें। इस प्रकार आप अपने सैनिकों व जमीन के प्राकृतिक लाभों का उपयोग कर सकेंगे।

जब ऊपरी देश में भारी बारिश होती है तो जिस नदी को आप पार करना चाहते हैं वह उफान पर आ जाती है तो आपको तब तक इंतजार करना चाहिए जब तक यह शांत न हो जाए। जिस प्रदेश में सीधी खड़ी चट्टानें जिनके बीच में तेज़ धाराएँ बहती हैं; जहाँ गहरे प्राकृतिक खड्ड, संकरे स्थान, घनी झाड़ियाँ, दलदल और दरारें होती है तो उन स्थानों तुरंत छोड़ दिया जाना चाहिए और उनके निकट नहीं जाना चाहिए। हालाँकि हमें उपरोक्त  जगहों से दूर रहना चाहिए पर हमें दुश्मन को उधर धकेलना चाहिए–जब हम सामने हो तो वे स्थान दुश्मन के पीछे होने चाहिए।

यदि आपके शिविर के पड़ोस में कोई पहाड़ी क्षेत्र, जलीय घास से घिरे तालाब, बेंत से भरे खोखले मुहाने या झाड़-झंखाड़ से भरे घने जंगल हैं तो उन्हें नष्ट करके खोजा जाना चाहिए क्योंकि ये वे स्थान हैं जहाँ घात लगाए लोग या कपटी जासूसी के दुबके होने की संभावना है।

जब दुश्मन काफी करीब होकर भी शांत रहता है तो वह अपनी स्थिति की प्राकृतिक ताकत पर भरोसा कर रहा है। जब वह दूर रहकर लड़ाई को भड़काने की कोशिश करता है तो वह दूसरे पक्ष के आगे बढ़ने के लिए बेचैन है।  यदि उसके शिविर स्थान तक पहुंच आसान है तो वह एक दाना (प्रलोभन ) डाल रहा है।

जंगल के पेड़ों के बीच हलचल से पता चलता है कि दुश्मन आगे बढ़ रहा है। मोटी घास के बीच में कई पर्दों की उपस्थिति का मतलब है कि दुश्मन हमें संदेह में डालना चाहता है।  उड़ान में पक्षियों का ऊपर बढ़ना एक घात ( छिपकर आक्रमण) का संकेत है, चौंके हुए जानवर संकेत देते हैं कि अचानक हमला होने वाला है।

जब धूल ऊँचे स्तम्भ के रूप में ऊपर उठती है तो यह रथों के आगे बढ़ने का संकेत है; जब धूल कम होती है लेकिन एक विस्तृत क्षेत्र में फैल जाती है तो यह पैदल सेना के आगमन का सूचक है। अलग-अलग दिशाओं में विभाजित धूल यह दर्शाती है कि सैनिक टोलियों को जलाऊ लकड़ी इकट्ठा करने के लिए भेजा गया है। धूल के कुछ बादलों का इधर से उधर हिलना डुलना संकेत देता है कि सेना पड़ाव डाल रही है।

विनम्र शब्द और बढ़ी हुई तैयारी यह संकेत है कि दुश्मन आगे बढ़ने वाला है। हिंसक भाषा और आक्रामकता से आगे बढ़ना इसका संकेत हैं कि वह पीछे हट जाएगा।  जब हलके रथ पहले बाहर आते हैं और किनारों पर  स्थान ले लेते हैं तो यह संकेत है कि दुश्मन लड़ाई के लिए व्यूह बना रहा है।

बिना प्रतिज्ञा पत्र के शांति प्रस्ताव षड्यंत्र को इंगित करता है।  जब बहुत भागदौड़ होती है और सैनिक पंक्ति में खड़े हो जाते हैं तो इसका मतलब है कि महत्वपूर्ण क्षण आ गया है। जब कुछ लोग आगे बढ़ते और कुछ पीछे हटते नज़र आते हैं तो यह एक लालच है। जब सैनिक अपने भालों पर झुक कर खड़े होते हैं तो वे भोजन की कमी से थक गए हैं। जो लोग पानी भरने के लिए भेजे जाते हैं वे खुद पीने से शुरू करते हैं तो सेना प्यास से पीड़ित है।

यदि दुश्मन को फायदा नज़र आने पर उसे पाने का कोई प्रयास नहीं करता है तो सैनिक थक गए हैं।  यदि पक्षी किसी भी स्थान पर इकट्ठा होते हैं तो वह जगह खाली है। रात में कोलाहल घबराहट का संकेत है। यदि शिविर में अव्यवस्था है तो सेनापति की पकड़ (रोब) कमजोर है। अगर पताकाएँ और झंडे स्थानांतरित किए जा रहे है तो देशद्रोह होने वाला है। यदि अधिकारी नाराज हैं तो इसका मतलब है कि सिपाही थके हुए हैं।

जब कोई सेना अपने घोड़ों को अनाज खिलाती है और अपने मवेशियों को भोजन के लिए मारती है और जब सिपाही अपने खाना पकाने के बर्तन को अलाव पर नहीं लटकाते हैं तो यह दर्शाता है कि वे अपने शिविर में नहीं लौटेंगे–तो आप जान सकते हैं कि वे मृत्यु तक लड़ने के लिए दृढ़ संकल्प हैं।

छोटे समूहों में फुसफुसाते हुए या मंद स्वरों में बोलते हुए पुरुषों का अर्थ आम सैनिकों में असंतोष की ओर इशारा करती है। बार बार पुरस्कार देना यह दर्शाता है कि दुश्मन के संसाधनों का अंत आ गया है; बार बार दंड देना सख्त संकट की स्थिति का सूचक है।

सतर्कता, एहतियात, कड़ी नज़र और व्यावहारिकता

गर्जना द्वारा शुरू लेकिन बाद में दुश्मन की संख्या से डर जाना बुद्धि की भारी कमी को दर्शाता है। जब प्रशंसा करते दूतों को भेजा जाता है तो यह एक संकेत है कि दुश्मन संधि चाहता है।  यदि दुश्मन की टुकड़ी गुस्से में मार्च करती है और लंबे समय तक लड़ाई में बिना शामिल हुए या बिना पीछे हटे लंबे समय तक हमारा सामना कर रही है तो यह स्थिति बहुत सतर्कता और एहतियात की मांग करती है।

यदि हमारी सेना दुश्मन से अधिक नहीं है तो यह पर्याप्त है; इसका केवल यह अर्थ है कि कोई भी सीधा हमला नहीं किया जा सकता है। हम जो कुछ भी कर सकते हैं, वह यह है कि हम अपनी सारी उपलब्ध शक्ति को केंद्रित करें, दुश्मन पर कड़ी नजर रखें और अतिरिक्त सैन्य मदद प्राप्त करें।

वह जो बिना सोच-विचार के कार्य करता है अपने विरोधियों को हलके में लेता है, उसका कैद कर लिया जाना निश्चित है। यदि सैनिकों को आपके साथ लगाव होने से पहले दंडित किया जाता है तो वे विनम्र साबित नहीं होंगे; और जब तक विनम्र नहीं होंगे तब तक व्यावहारिक रूप से बेकार होंगे।  जब सैनिक का आपके साथ लगाव हो गया हो पर दंड लागू नहीं किए जाते हैं तो भी वे किसी काम के नहीं रहेंगे।

इसलिए सैनिकों के साथ हमेशा मानवीय व्यवहार किया जाना चाहिए लेकिन सख्त अनुशासन के माध्यम से नियंत्रण में रखा जाना चाहिए– यह जीत की एक निश्चित राह है।  यदि प्रशिक्षण में सैनिकों पर आदेश आदतन और आवश्यक रूप से लागू किए जाते हैं तो सेना अच्छी तरह से अनुशासित हो जाएगी; यदि नहीं तो इसका अनुशासन खराब होगा। यदि एक सेनापति अपने सैनिकों पर विश्वास दर्शाता है लेकिन हमेशा अपने आदेशों का पालन करने पर जोर देता है तो उन्हें पारस्परिक लाभ होगा।

अध्याय 9: समाप्त 

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